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विकी8 मिनट का पाठ

भारत में ऑडियो कैसेट और उसने क्या बदला

ऑडियो कैसेट एक चपटा प्लास्टिक का डिब्बा था. अंदर दो रील और उनके बीच से गुज़रता भूरे रंग का चुंबकीय टेप. अस्सी के दशक की शुरुआत से यही भारत में रिकॉर्ड किया हुआ संगीत अपने पास रखने का सबसे सस्ता तरीक़ा बन गया. आगे की पूरी कहानी उसी दाम से निकलती है.

चीज़ क्या थी

कैसेट के दो साइड होते थे, A और B. एक ख़त्म होता तो आप उसे निकालकर, पलटकर वापस डाल देते थे. लंबाई मिनटों में नापी जाती थी. आमतौर पर साठ और नब्बे मिनट के, कभी कभी एक सौ बीस मिनट के भी.

आगे की तरफ़ दो छोटी खिड़कियाँ होती थीं, जिनसे दिखता था कि किस रील पर कितना टेप बचा है. डिब्बी के अंदर मुड़ा हुआ काग़ज़ का इनले कार्ड रहता था, जिस पर फ़िल्म का नाम और गानों की सूची छपी होती थी. उसकी पिछली सादी तरफ़ लोग बॉलपेन से लिखते थे, अगर टेप पर कुछ ऐसा भरा हो जो छापने वालों ने सोचा ही न हो.

टेप ढीला हो जाता था. उसका इलाज एक ही था. रील के छेद में पेंसिल डालकर हाथ से घुमाना, जब तक ढीलापन वापस अंदर न चला जाए. जिसके पास कैसेट थे, उसने यह किया ही है.

बजाने की मशीन आमतौर पर टू इन वन होती थी. एक ही प्लास्टिक बॉडी में रेडियो और कैसेट प्लेयर, ऊपर उठाने वाला हैंडल और सामने स्पीकर की जाली. घर में वह शेल्फ़ पर रखी रहती थी. दुकान में जहाँ तक तार पहुँच जाए, वहीं.

1983 से पहले संगीत महँगा था

उससे पहले रिकॉर्ड किया हुआ संगीत मतलब ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड, और रिकॉर्ड महँगे थे. बाज़ार पर HMV यानी ग्रामोफ़ोन कंपनी ऑफ़ इंडिया का क़ब्ज़ा था. रिकॉर्ड की दुकानें गिनी चुनी थीं और शहरों में थीं. संगीत ख़रीदकर रखना मध्यवर्ग और उससे ऊपर वालों का काम था.

इसका मतलब यह नहीं कि लोग फ़िल्मी गाने सुनते नहीं थे. मतलब यह था कि वे उन्हें घर के अलावा कहीं और सुनते थे. सिनेमा में, रेडियो पर, या टेलीविज़न पर उन तय स्लॉट में जो सरकारी प्रसारण तय करता था. टीवी पर इसका मतलब था हफ़्ते में दो बार आधे घंटे का Chitrahaar, फ़िल्मी गानों का वह कार्यक्रम. रेडियो पर मतलब था घंटे भर दूसरों की फ़रमाइशें सुनना, इस उम्मीद में कि अपनी भी बज जाए. इसी आदत से झुमरी तिलैया नाम का एक छोटा सा क़स्बा फ़रमाइशों के लिए मशहूर हो गया.

इन सब में तय कोई और करता था. कैसेट ने जो नई चीज़ दी, वह बेहतर संगीत नहीं था. वह यह था कि अब दुकानदार ख़ुद तय कर सकता था कि दिन भर क्या बजेगा, और जो भी अंदर आए उसे वही सुनना पड़ेगा.

1983 और दाम की लड़ाई

गुलशन कुमार दिल्ली में फलों का जूस बेचते थे. 11 जुलाई 1983 को उन्होंने सुपर कैसेट्स इंडस्ट्रीज़ शुरू की. यही कंपनी आगे चलकर T-Series बनी.

उनका तरीक़ा दो हिस्सों में था. पहला, दाम. वे कैसेट असली दाम के लगभग एक तिहाई पर बेचते थे. दूसरा, कैटलॉग. उन्होंने पुराने हिंदी फ़िल्मी गानों के हज़ारों नए रिकॉर्ड किए हुए संस्करण निकाले, जिनके अधिकार HMV के पास थे. इसके लिए उन्होंने भारतीय कॉपीराइट क़ानून के फ़ेयर यूज़ वाले प्रावधान का सहारा लिया. यह हिस्सा अदालतों में लड़ा गया और आज भी विवादित है.

नतीजा जल्दी आया और एकतरफ़ा था. HMV की बिक्री बैठ गई. अस्सी के दशक के बीच तक बाज़ार का क़रीब 95 प्रतिशत हिस्सा कैसेट का था. उद्योग की कमाई 1980 में लगभग 12 लाख डॉलर से बढ़कर 1990 में क़रीब 2 करोड़ 10 लाख डॉलर हो गई.

T-Series का शुरुआती कैटलॉग कोई प्रतिष्ठा वाला माल नहीं था. भक्ति संगीत और कम बजट की फ़िल्मों के गाने, और निशाने पर वे गाँव और क़स्बे के घर थे जिन्होंने कभी संगीत ख़रीदा ही नहीं था.

1997 में मुंबई में गुलशन कुमार की हत्या कर दी गई. कंपनी के इतिहास में लंबी क़ानूनी लड़ाइयाँ और संगठित अपराध से जुड़े आरोप भी हैं, और अलग अलग जगहों पर इसका ब्योरा अलग अलग ढंग से लिखा गया है. यह पन्ना उस बहस को निपटाने की कोशिश नहीं करता.

दुकान

कैसेट की दुकान अक्सर दुकान कम, काउंटर ज़्यादा होती थी. पीछे शेल्फ़ों पर कैसेट कतार में खड़े रहते थे, रीढ़ बाहर की तरफ़, ताकि आप उन्हें किताबों की तरह पढ़ सकें. कोनों में और ढेर लगे रहते थे. काउंटर पर रखा टू इन वन वही बजाता था जो मालिक ने सुबह लगाया हो, और वही दुकान का इश्तिहार भी था.

इनमें से बहुत सी दुकानें फ़रमाइश पर टेप भी भर देती थीं. आप एक ख़ाली कैसेट ख़रीदते, गानों के नाम बताते, और दुकानवाला उन्हें उस पर उतार देता, कभी कभी इनले कार्ड पर हाथ से सूची भी लिख देता. उस दौर की यह सबसे ज़्यादा दोहराई जाने वाली यादों में से एक है. हमारी रिसर्च में इसका कोई दस्तावेज़ी ब्योरा नहीं मिला कि यह काम कैसे होता था और कितना फैला हुआ था, इसलिए इसे याद मानिए, दर्ज तथ्य नहीं.

वह शेल्फ़ जो तय करती थी कि पूरी गली क्या सुनेगी

सस्ते कैसेट ने यह बदल दिया कि संगीत रहता कहाँ है. जब कैसेट रिकॉर्ड के एक तिहाई दाम पर आ गया, तो नाई भी उसकी एक शेल्फ़ भर सकता था. चाय की टपरी, ढाबे वाला, बस कंडक्टर और ट्रक ड्राइवर भी.

नाई की दुकान इसकी सबसे साफ़ मिसाल है, क्योंकि उसका ब्योरा हर जगह एक जैसा मिलता है. गाँवों में लकड़ी का एक छप्पर, बड़ा सा शीशा, शेव के लिए गर्दन टिकाने वाली पुरानी लकड़ी की कुर्सी और एक घिसा हुआ गद्दा. क़स्बों में सीटों की दो कतारें, दीवारों पर शीशे, देवी देवताओं के कैलेंडर, और एक टीवी या सस्ता साउंड सिस्टम जिस पर स्थानीय हिट बजते रहते.

असल बात यही आख़िरी चीज़ है. गले में कपड़ा बँधा है और आप बीस मिनट कुर्सी पर हैं. न उठ सकते हैं, न बजता हुआ गाना बदल सकते हैं. उस गली के लिए नाई की शेल्फ़ ही प्लेलिस्ट थी.

अब इसमें जोड़िए एक छोटा सा कैटलॉग जो सस्ते में हर जगह एक साथ बिक रहा था. नतीजा विविधता नहीं निकलता. नतीजा यह निकलता है कि पूरे देश में एक जैसे कमरों में एक ही तरह के गाने बजते हैं. एक पूरी पीढ़ी को एक ही गाने क्यों याद हैं, इस पर हमने अलग से लिखा है, और उसका ज़्यादातर जवाब नाई की यही शेल्फ़ है.

कुछ ही संगीतकार पूरे दशक पर क्यों छाए रहे

नब्बे के दशक की आवाज़ किसकी थी, यह पूछिए तो वही नाम लौटकर आते हैं. बीच में बैठते हैं नदीम सैफ़ी और श्रवण राठौड़, यानी नदीम-श्रवण.

1990 की आशिकी इसका मोड़ है. महेश भट्ट ने फ़िल्म को उसके गानों के इर्द गिर्द बनाया. संगीत नदीम-श्रवण का, आवाज़ें कुमार सानू और अनुराधा पौडवाल की, और वह उस दौर का सबसे ज़्यादा बिकने वाला हिंदी फ़िल्मी एल्बम बन गया. जो साँचा वहाँ बना, वही बाक़ी दशक चला. पहले धुन, फिर रोमांस, और गाने ऐसे जो सिनेमा में देखने से पहले कैसेट पर बिकने के लिए बने हों. साजन, दिल है कि मानता नहीं और राजा हिंदुस्तानी उसी शक्ल के हैं.

उनका साज़ भी इस माध्यम के हिसाब का था. पॉप वाले गानों के साथ साथ उन्होंने तबला, वीणा और वायलिन पर लिखा, और यह ऐसा साज़ है जो गर्म कमरे में रखे सस्ते स्पीकर पर भी बचा रहता है. जो संगीत ख़राब मशीन पर भी काम करता है, वही नाई की दुकान तक पहुँचता है.

यह असंतुलन कितना बड़ा था, इसका एक संकेत. हाल में इसी तरह की सार्वजनिक सुनवाई को दिखाने के लिए बनाई गई 133 गानों की एक चुनी हुई सूची में 28 गाने नदीम-श्रवण के हैं, जबकि अनु मलिक के 18, जतिन-ललित के 18 और ए. आर. रहमान के 13. गाने वालों में कुमार सानू और अलका याज्ञनिक के 42-42, उदित नारायण के 34 और लता मंगेशकर के 20. यह किसी की बनाई सूची है, बिक्री का चार्ट नहीं, इसलिए इसे संकेत भर मानिए. लेकिन उसकी शक्ल वही है जो लोगों की याद में है.

नदीम सैफ़ी का नाम बाद में गुलशन कुमार की 1997 की हत्या के सिलसिले में आया और वे भारत छोड़कर चले गए. बाद में वे बरी हुए. इस घटना ने इस जोड़ी का शिखर पर चलता दौर ख़त्म कर दिया.

इस पूरे कैटलॉग की शुरुआत आमतौर पर 1986 के पंकज उधास वाले रिकॉर्ड चिट्ठी आई है से मानी जाती है और अंत 1998 के छैयाँ छैयाँ पर.

टेप और भी बहुत कुछ ले जाता था

कैसेट बजता जितनी आसानी से था, रिकॉर्ड भी उतनी ही आसानी से होता था. इसी वजह से वह संगीत के अलावा एक और काम आया.

अस्सी और नब्बे के दशक में खाड़ी के देशों में काम करने वाले भारतीय, ख़ासकर केरल और तेलुगु ज़िलों से, चिट्ठी लिखने की जगह कैसेट पर अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करके घर भेजते थे. बहुतों ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे लिख नहीं सकते थे. पूरा परिवार रिकॉर्डर के आसपास बैठकर उसमें बोलता था, और फिर लगभग एक महीने इंतज़ार करता था कि जवाब वाला कैसेट लौटकर आए.

जो सस्ती चीज़ फ़िल्मी गाने हर नाई की दुकान तक ले जा रही थी, वही लोगों की अपनी आवाज़ें समंदर पार भी ले जा रही थी.

टेप के बाद

कैसेट सीडी से हारा, सीडी एमपी3 फ़ाइल से हारी, और कैटलॉग बिना ज़्यादा नुक़सान के इंटरनेट पर चला आया. T-Series आज यूट्यूब के सबसे ज़्यादा सब्सक्राइबर वाले चैनलों में है, और उसके पास वही गाने हैं. जिस कंपनी ने 1985 में इस संगीत को इतना सस्ता किया कि वह हर जगह पहुँच गया, उसी की वजह से 2026 में यह मुफ़्त में बजता है.

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