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बिनाका गीतमाला, साल दर साल: किसी भी बरस में वो शो क्या था
Binaca Geetmala रेडियो पर हिंदी फ़िल्मी गानों की हफ़्तेवार गिनती थी। इसकी शुरुआत 1952 में Radio Ceylon पर हुई, जो कोलंबो से प्रसारित होता था, और यह करीब चार दशक चली।
दिलचस्प बात यह है कि लोग इसे अकेले नाम से खोजते ही नहीं। वे साल जोड़कर खोजते हैं। अगस्त 2026 तक के एक साल में भारत से इस शो के आसपास सबसे ज़्यादा खोजा गया, बिनाका गीतमाला 1980, फिर 1970, और फिर पूरा दौर माँगता एक वाक्यांश, 1953 से 2000। सुझावों में भी यही रंग है। 1975, 1964, 1973, 1990, 1991, 1966।
तो यह पन्ना उसी पाठक के लिए है जो खोज में एक साल टाइप करता है। इसमें है कि शो अपने किसी भी बरस में क्या था, गिनती किस आधार पर बनती थी, और किसी एक साल के बारे में ईमानदारी से क्या कहा जा सकता है और क्या नहीं।
हर साल बिनाका गीतमाला थी क्या
हिंदी फ़िल्मी गानों की एक क्रम में लगी सूची, हफ़्ते में एक बार, हवा पर।
बस इतना ही फ़ॉर्मैट था, और यह ज़्यादा बदला नहीं। गाने वही होते थे जो उस वक़्त चल रहे थे। बीच में मेज़बान बोलता था। गीतकार कौन, संगीतकार कौन, गाया किसने, और उनसे जुड़ा कोई क़िस्सा या कोई संघर्ष। वह बातचीत भी उतनी ही प्रोग्राम थी जितना संगीत।
शो के होने की वजह फ़ॉर्मैट से भी अजीब है। 1952 में भारत के अपने सरकारी रेडियो ने तय किया कि वह हिंदी फ़िल्मी गाने नहीं बजाएगा, तो सुनने वाले अपने ही गाने सुनने दूसरे मुल्क के स्टेशन पर चले गए। वह पूरी कहानी, और उससे निकली पोस्टकार्ड की आदत, हमने झुमरी तलैया को मशहूर करने वाली फ़रमाइशों वाले पन्ने पर लिखी है।
गिनती का क्रम तय कैसे होता था
किसी जूरी से नहीं। सुनने वालों से, कम से कम शुरू में।
शुरुआती बरसों में क्रम श्रोताओं की फ़रमाइशों से बनता था। बाद में यह रिकॉर्ड की बिक्री से तय होने लगा। किसी ख़ास साल को समझने के लिए यह फ़र्क़ मायने रखता है। शुरुआती दौर में ऊँचा नंबर बताता है कि कितने लोगों ने बैठकर चिट्ठी लिखी। बाद के दौर में ऊँचा नंबर बताता है कि कितने लोगों ने रिकॉर्ड ख़रीदा।
हमारे स्रोत यह तय नहीं करते कि तरीक़ा ठीक किस साल बदला। साफ़ लकीर खींचने से बेहतर है कह देना कि जोड़ धुँधला है।
चिट्ठियों की तादाद पर एक पल रुकना बनता है। शो के बाद के बरसों में करीब चार सौ रेडियो क्लब और हज़ारों श्रोता हर रोज़ लिख रहे थे। हालत यह हुई कि All India Radio को छपे हुए फ़रमाइश पोस्टकार्ड निकालने पड़े।
कितने साल चली, और कहाँ से कहाँ गई
Radio Ceylon पर 1952 से 1988 तक। उसके बाद All India Radio की अपनी फ़िल्मी संगीत सेवा Vividh Bharati पर, 1989 से 1994 तक।
वही शो, दो घर। इस अदला बदली में एक हल्की सी विडंबना है, क्योंकि Vividh Bharati खुद 3 अक्टूबर 1957 को इसीलिए शुरू हुई थी कि भारत अपने श्रोता और अपने विज्ञापन कोलंबो के हाथों गँवा चुका था। यह सेवा आज भी चल रही है, और आज इसे खोजने वाले ज़्यादातर लोग बस अभी सुनना चाहते हैं, जिस पर हमने Vividh Bharati ऑनलाइन सुनने वाला पन्ना लिखा है।
एक बात साफ़ कर देनी चाहिए, क्योंकि वह एक लोकप्रिय खोज के अंदर ही बैठी है। लोग बिनाका गीतमाला 1953 से 2000 खोजते हैं। हमारे स्रोत इसका दौर 1952 से 1994 बताते हैं। आख़िर के उन छह बरसों का हिसाब हमारे पास नहीं है, और 1994 के बाद इस नाम से क्या चला, यह हमने जाँचा नहीं है। अगर आपने कोई भरोसेमंद स्रोत देखा है जो यह तय करता हो, तो वह स्रोत इस पैराग्राफ़ से ज़्यादा क़ीमती है।
बुधवार, और एक साल का असल मतलब
बहुत सारे घरों में बुधवार गीतमाला का दिन कहलाने लगा।
यही हफ़्तेवार लय है जिसने याद को शक्ल दी। लोग पहले से बहस करते थे कि इस बार पहले पायदान पर कौन सा गाना आएगा, और उस पर शर्तें लगती थीं। गिनती हफ़्ते की एक छोटी सार्वजनिक घटना थी, और तय वक़्त पर आती थी।
इससे एक बात निकलती है जो साफ़ कहनी चाहिए। बिनाका गीतमाला का एक साल कोई एक बार छपी हुई सूची नहीं था। वह करीब पचास प्रसारण थे, जिनमें गाने चढ़ते, टिकते और गिरते रहते थे। कोई पूछे कि 1980 की बिनाका गीतमाला क्या थी, तो ईमानदार जवाब यही है कि वह हफ़्तेवार गिनतियों का एक पूरा बरस था, कोई एक रैंकिंग नहीं।
एक साल के बारे में क्या पता चल सकता है, और क्या नहीं
काफ़ी कुछ पता चल सकता है। दौर के किसी भी साल के लिए अब आप जानते हैं कि फ़ॉर्मैट क्या था, स्टेशन कौन सा था, मेज़बान कौन था और गाने किस आधार पर क्रम में लगते थे। यह सब ऊपर है।
जो एक चीज़ हम नहीं दे सकते, वह ख़ुद गिनती है।
हमारी अपनी रिसर्च इस पर खुलकर निशान लगाती है। 1952 से 1994 तक की असली हफ़्तेवार रैंकिंग शायद ठीक से डिजिटल हुई ही नहीं है, और उसकी कोई प्रति हमने जाँची नहीं है। इसलिए हम साल दर साल नंबर वन गानों की सूची नहीं छाप रहे। गढ़ी हुई सूची न होने से भी बुरी है, क्योंकि वह आगे कॉपी होती है, हवाला बनकर लौटती है, और दोहराते दोहराते रिकॉर्ड जैसी दिखने लगती है।
ऐसी सूचियाँ आपको कहीं और मिल जाएँगी। फ़ैन संकलन, यूट्यूब प्लेलिस्ट के विवरण, फ़ोरम की पोस्ट, और सब पूरे आत्मविश्वास के साथ। हो सकता है कुछ सही भी हों। भरोसा करने से पहले पूछिए कि नंबर आए कहाँ से, और क्या आप उन्हें जाँच सकते हैं। बिना स्रोत की आश्वस्त सूची आख़िर में सिर्फ़ एक आश्वस्त सूची है।
रैंकिंग के मुक़ाबले गाने ख़ुद कहीं आसानी से मिल जाते हैं। हमारी नब्बे के दशक के हिंदी गानों की A to Z सूची आपको शो के आख़िरी बरसों के संगीत तक ले जाएगी, और आज खोजने वाले ज़्यादातर लोगों ने वही दौर जिया है।
लोग इसे साल की तरह ही क्यों याद रखते हैं
अकेले नाम से कोई क्यों नहीं खोजता, इसकी वजह है।
यह ऐसा शो नहीं था जिसमें आप कभी कभी झाँक लें। यह हर हफ़्ते वही तय मुलाक़ात थी, ऐसे लोगों के लिए जिनके पास नया फ़िल्मी संगीत सुनने के दूसरे रास्ते कम थे। तो यह प्रोग्राम रहना छोड़कर कैलेंडर का हिस्सा बन गया। आपको गिनती याद नहीं रहती। आपको वह साल याद रहता है जब इम्तिहान थे, या जब शहर बदला, और उसके भीतर बजती हुई गिनती याद रहती है।
गाने साझा क्यों हैं, इसकी भी यही वजह है। सुनने वालों में से किसी ने वे गाने चुने नहीं थे, और सबने एक ही हफ़्ते एक ही गाने सुने। इस पर हमने अलग से लिखा है, सबको एक ही गाने क्यों याद हैं।
गिनती पढ़ने वाली आवाज़ Ameen Sayani की थी, जो 1951 में Radio Ceylon से जुड़े और चार दशक तक यह शो पेश करते रहे। हर प्रसारण की शुरुआत एक ही तरह होती थी, बहनो और भाइयो, आपकी ख़िदमत में अमीन सयानी का आदाब। 2024 में इक्यानबे बरस की उम्र में उनका निधन हुआ। अगस्त 2026 तक के एक साल में इस शो से जुड़े विषयों में भारत में सबसे तेज़ी से चढ़ने वाला नाम उन्हीं का था, 120 प्रतिशत ऊपर। साल खोजने वाले लोग घूमकर उन तक पहुँचते रहते हैं, और यह ठीक ही है। ज़्यादातर श्रोताओं के लिए शो वही थे।