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विविध भारती: वह रेडियो जिसे लोग आज भी लाइव सुनना चाहते हैं

विविध भारती ऑल इंडिया रेडियो की फ़िल्मी संगीत सेवा है। यह 3 अक्टूबर 1957 को शुरू हुई थी। और यह आज भी प्रसारित हो रही है, यानी इस पूरी साइट पर हम जिन चीज़ों की बात करते हैं, उनमें सबसे पुरानी और अब भी ज़िंदा चीज़ यही है।

यह तो हुई सीधी सादी बात। असली वजह कुछ और है जिसके लिए हमने इसे अलग पन्ना दिया।

अगस्त 2026 में हमने 1990 के दशक के भारत से जुड़े तीस सर्च शब्दों पर रिसर्च की। गानों से जुड़े लगभग सारे सर्च ख़रीदारी जैसे थे। लोगों को फ़ाइल चाहिए थी। वे डाउनलोड लिखते थे, एमपी3 लिखते थे, या किसी पायरेसी वाली साइट का नाम लिखते थे। तीस में से सिर्फ़ एक शब्द अलग शक्ल का था। विविध भारती खोजने वाले लोग किसी चीज़ की कॉपी नहीं माँग रहे थे। वे पूछ रहे थे कि कान कहाँ लगाएँ।

पूरी सूची में जो नाम सबसे पुराना है, वही अकेला नाम है जिसे लोग अब भी लाइव सुनना चाहते हैं।

सर्च असल में क्या बता रहा है

इस शब्द से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल है, vividh bharati live। उसके बाद radio vividh bharati, फिर online vividh bharati, फिर vividh bharati live radio। ऑटोकंप्लीट में वही मिज़ाज और साफ़ दिखता है, जैसे कोई गाना नहीं, सिग्नल ढूँढ रहा हो: vividh bharati fm, vividh bharati kolkata live, vividh bharati radio program today

आख़िरी वाला सवाल सब कुछ खोल देता है। कोई पूछ रहा है कि आज दोपहर क्या बज रहा है। यह सवाल किसी याद के बारे में नहीं पूछा जाता।

एक चेतावनी ज़रूरी है, क्योंकि ये आँकड़े अक्सर ग़लत तरीक़े से पेश किए जाते हैं। गूगल ट्रेंड्स के नंबर एक ही शब्द के अपने नतीजों के भीतर, शून्य से सौ के पैमाने पर होते हैं। वे न विज़िटर की गिनती हैं और न अलग अलग शब्दों के बीच तुलना के लायक़। इसलिए हम माँग की शक्ल के बारे में दावा कर रहे हैं, उसके आकार के बारे में नहीं। ये लोग क्या चाहते हैं, यह हमें पता है। कितने हैं, यह नहीं।

ऑल इंडिया रेडियो ने विविध भारती बनाई ही क्यों

विविध भारती इसलिए है क्योंकि सरकार अपने ही श्रोताओं से बहस हार गई थी।

1952 में सूचना और प्रसारण मंत्री बी. वी. केसकर ने तय किया कि ऑल इंडिया रेडियो हिंदी फ़िल्मी गाने नहीं बजाएगा। उन्हें ये गाने सस्ते और ज़रूरत से ज़्यादा पश्चिमी लगते थे। शुरुआत दस फ़ीसदी की सीमा से हुई, फ़िल्म प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया से बातचीत टूट गई, और उसके बाद कई साल तक फ़िल्मी संगीत पूरी तरह बंद रहा। एक नियम और था, जो उस दौर का मिज़ाज बता देता है। कोई फ़िल्मी गाना बजा भी तो फ़िल्म का नाम नहीं लिया जा सकता था, क्योंकि उसे विज्ञापन माना जाता था।

गानों की लोकप्रियता पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। सुनने वाले बस कहीं और चले गए। रेडियो सीलोन ने कोलंबो से, उस ताक़तवर शॉर्टवेव ट्रांसमीटर से जो अमेरिकी लड़ाई के बाद छोड़ गए थे, हिंदी फ़िल्मी गाने भारत की तरफ़ भेजने शुरू किए, और देश अपने ही गाने सुनने के लिए दूसरे मुल्क का स्टेशन लगाने लगा। श्रोताओं के पीछे पीछे विज्ञापन भी चले गए।

पाँच साल बाद विविध भारती उसी का जवाब थी। भारत ने फ़िल्मी संगीत का चैनल इसलिए बनाया, क्योंकि उसने अपने श्रोते श्रीलंका के हाथों गँवा दिए थे।

इस बात पर ठहरना चाहिए। जिस सेवा को आज लाखों लोग विरासत की तरह खोजते हैं, वह असल में एक मुक़ाबले का जवाब थी, उसी सरकार की तरफ़ से जो पाँच साल तक कह रही थी कि यह संगीत प्रसारण के लायक़ ही नहीं है।

एक दिन का प्रसारण कैसा लगता था

हम घंटे दर घंटे का शेड्यूल यहाँ नहीं छापेंगे, क्योंकि हमारे पास ऐसा कोई भरोसेमंद शेड्यूल नहीं है, और वैसे भी दशकों में समय बदलते रहे। हमारी रिसर्च में जो दर्ज है वह कार्यक्रमों की सूची है, और उसी से पूरे दिन का मिज़ाज समझ आता है।

रीढ़ फ़िल्मी गाने थे। उनके इर्द गिर्द ऐसे कार्यक्रम थे जो बिल्कुल अलग काम कर रहे थे। छाया गीत में फ़िल्मी संगीत के साथ शास्त्रीय और लोक संगीत घुला हुआ था। संगीत सरिता जो भी सुन रहा हो, उसे शास्त्रीय संगीत सिखाती थी। हवा महल हर रात छोटे नाटकों की कड़ी थी, यानी शाम को गानों का सिलसिला हँसी से टूटता था। जयमाला 1964 में शुरू हुई, जिसमें मुश्किल इलाक़ों में तैनात फ़ौजी भाइयों के लिए फ़िल्मी गाने बजाए जाते थे।

और 1989 से 1994 तक इसी सेवा पर बिनाका गीतमाला चली, वह साप्ताहिक गिनती जिसने अपने पहले छत्तीस साल रेडियो सीलोन पर बिताए थे। जिस पाबंदी ने कार्यक्रम को कोलंबो पहुँचाया था, आख़िर में वह कार्यक्रम उसी पाबंदी से पैदा हुए स्टेशन पर लौट आया।

तो एक दिन में संगीत था, पर सिर्फ़ संगीत नहीं। उस संगीत में एक उस्ताद भी था, एक हँसाने वाला भी, और कहीं दूर सरहद पर बैठा एक फ़ौजी भी।

सुनने वाले इसे चिट्ठियाँ लिख रहे थे

शेड्यूल का बड़ा हिस्सा हाथ से लिखी फ़रमाइशों पर चलता था। इस आदत का अपना नाम है, फ़रमाइश, और अपनी अजीब कहानी भी, जिसमें झारखंड का एक छोटा सा अभ्रक वाला कस्बा इतने कार्ड भेजता था कि उसका नाम देश भर में मज़ाक बन गया। वह पूरा किस्सा हमने झुमरी तिलैया को मशहूर करने वाली फ़रमाइशों वाले पन्ने पर अलग से लिखा है, और अगर आप उसी के लिए आए हैं तो वहीं से शुरू कीजिए।

यहाँ काम की बात तादाद है। चिट्ठियाँ इतनी आने लगीं कि ऑल इंडिया रेडियो को फ़रमाइश के लिए छपे हुए पोस्टकार्ड निकालने पड़े। 1989 में विविध भारती को जो गिनती विरासत में मिली, वह शुरुआती सालों में इन्हीं फ़रमाइशों से बनती थी, और उसे हमने बिनाका गीतमाला की साल दर साल गिनती में खोलकर रखा है।

उस दौर के रेडियो और बाद के टेलीविज़न का फ़र्क़ यही है। चित्रहार आपके लिए गाने चुनता था और उस चुनाव से बहस नहीं हो सकती थी। रेडियो पहले पूछता था। फिर भी दोनों से बनी साझा याद हैरान करने की हद तक एक जैसी है, और उसकी वजह हमने सबको एक ही गाने क्यों याद हैं में लिखी है।

यह आज भी चल रही है, और असल बात यही है

विविध भारती नॉस्टैल्जिया की चीज़ इसलिए नहीं बनी, क्योंकि वह कभी रुकी ही नहीं। 1964 में शुरू हुई जयमाला हमारी रिसर्च में आज भी चलती हुई दर्ज है। लोग शहर के हिसाब से आज का कार्यक्रम खोज रहे हैं, और ऑटोकंप्लीट में कोलकाता और मुंबई दोनों दिखते हैं।

⚠️ तकनीकी ब्यौरे के मामले में सावधान रहिए, क्योंकि हमने उन्हें जाँचा नहीं है। आपके शहर में यह सेवा किस फ़्रीक्वेंसी पर आती है, या कौन सी स्ट्रीम असली है, यह हम नहीं बता सकते, और अंदाज़े से लिखना भी नहीं चाहते। हमारे आँकड़ों में एफ़एम प्रसारण और एक एफ़एम फ़्रीक्वेंसी दोनों उभरते हुए विषय थे, जिससे लगता है कि एफ़एम यहाँ अहम है, पर एक उभरता हुआ विषय स्टेशनों की सूची नहीं होता। लाइव सुनना है तो प्रसारक की अपनी सेवा पर जाइए, किसी नॉस्टैल्जिया साइट पर छपे नंबर पर भरोसा मत कीजिए।

हमें यह क्यों अहम लगता है

1990 के दशक की जिन चीज़ों को लोग खोजते हैं, वे सब ख़त्म हो चुकी हैं। धारावाहिक बंद हो गए। चित्रहार उस अभिलेखागार में है जहाँ आसानी से कोई नहीं पहुँच सकता। गाने अब फ़ाइलें हैं, इधर से उधर भेजी जाती हुईं, और सर्च के आँकड़े यही दिखाते हैं।

विविध भारती अकेला धागा है जो अब भी काता जा रहा है। इसी वक़्त कोई स्टूडियो में बैठा तय कर रहा है कि अगला गाना क्या बजेगा, ठीक जैसे 1957 में कोई बैठा था, और किसी दूसरे शहर में कोई आदमी चार शब्द टाइप करके पूछ रहा है कि वह गाना क्या है।

यह आम मतलब वाला नॉस्टैल्जिया नहीं है। नॉस्टैल्जिया रुकी हुई चीज़ को पीछे मुड़कर देखता है। यहाँ श्रोता कहीं गया ही नहीं, वह चुपचाप जाँच रहा है कि स्टेशन अब भी वहीं है या नहीं।

है। और यही वजह है कि हम डाउनलोड की सूचियाँ नहीं, सुनने वाले कमरे बना रहे हैं।

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